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संस्थान में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियाँ एवं ऐतिहास िक सामग्री भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं।
पाण्डुलिपि (ताड़पत्र )
ताड़ (ताल) के सूखे पत्तों पर लिखी पाण्डुलिपियाँ तालपत्र कहलाती हैं। पाण्डुलिपि के लिये तालपत्र का उपयोग एशिया के कुछ भागों (मुख्यत: भारत) में १५वीं शती ईसापूर्व तक मिलता है। आरम्भ में ज्ञान मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित होता था। किन्तु लिपि के आविर्भाव के उपरान्त ज्ञान को तालपत्रों पर लिखकर सुरक्षित किया जाने लगा।
पाण्डुलिपि ( भोजपत्र )
भोजपत्र (विज्ञान नाम: Betula utilis) हिमालय क्षेत्र में उगने वाले एक वृक्ष की छाल है, जिसे प्राचीन काल में लेखन का मुख्य माध्यम बनाया जाता था। भोजपत्र पर लिखी गई पांडुलिपियां सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह सकती हैं। वर्तमान में ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखी गई पांडुलिपियां सबसे अधिक पाई जाती हैं, जिनमें से कई मंदिरों और संग्रहालयों में संरक्षित हैं।

पाण्डुलिपि (कागज )
पाण्डुलिपि वह दस्तावेज है जो एक या अधिक लोगों द्वारा हाथ से लिखा गया हो।
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परिभाषा: मुद्रित या यांत्रिक/वैद्युत तरीके से तैयार सामग्री को पाण्डुलिपि नहीं माना जाता।
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सतह: यह कागज, ताड़पत्र, भोजपत्र, चमड़ा या धातु जैसी सतह पर लिखा जाता है।
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इतिहास: कागज के आगमन के बाद भी, लिखा हुआ मसौदा ही पाण्डुलिपि कहलाता रहा।
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वैकल्पिक नाम: इसे हस्तलेख या हस्तलिपि भी कहा जाता है।
पाण्डुलिपि (नक्शा )
पाण्डुलिपि और नक्शा (Map) दो भिन्न अवधारणाएँ हैं:
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पाण्डुलिपि मुख्य रूप से ज्ञान, साहित्य, धर्म या विज्ञान से जुड़ी हस्तलिखित रचनाएँ होती हैं।
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नक्शा भौगोलिक स्थानों, सीमाओं और भू-आकृतियों का चित्रात्मक प्रतिनिधित्व है।
यद्यपि ऐतिहासिक रूप से कई नक्शे भी हस्तलिखित रूप में (हस्तलिखित नक्शे) बनाए गए हैं, लेकिन शब्द "पाण्डुलिपि" का प्रयोग सामान्यतः पाठ्य ग्रंथों या दस्तावेजों के लिए होता है, न कि केवल भूगोल संबंधी चित्रों के लिए। यदि आपका तात्पर्य "हस्तलिखित नक्शे" से है, तो वे पाण्डुलिपि श्रेणी के अंतर्गत आ सकते हैं, परंतु "पाण्डुलिपि" का सामान्य अर्थ केवल "नक्शा" नहीं है।

चाँदी सामग्री
चाँदी (Silver) एक बहुमूल्य धातु है जिसका उपयोग आभूषणों, सिक्कों, बर्तनों और औद्योगिक उपकरणों में प्रमुखता से किया जाता है। इसकी शुद्धता को मापने और इसके निवेश मूल्य को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं:
प्राचीन धातु धरोहर संग्रह


ताम्र / पीतल सामग्री
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पारंपरिक रसोई के बर्तन: प्राचीन काल में ताँबे के कलश, लोटा, पीतल की परात, बटलोई और मसाले दानी का उपयोग खूब होता था।
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सजावटी और विंटेज सामग्रियां: घर की शोभा बढ़ाने के लिए पुरानी डिज़ाइन वाले पीतल के हाथी, उड़ते हुए पक्षी, कल्पवृक्ष, और बारीक नक्काशीदार गुलदस्ते (Vases) बहुत लोकप्रिय हैं।
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पूजा और धार्मिक सामग्री: पुराने समय के भारी पीतल के दीये, प्रणावलियाँ (Prabhavali), और घंटियाँ आज भी अपनी सकारात्मक ऊर्जा के लिए पसंद की जाती हैं।
लोहा सामग्री
भारत में लौह धातुकर्म (Iron Metallurgy) का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और वैज्ञानिक रूप से बेहद उन्नत रहा है। भारतीय इतिहास में लोहे (Iron) का उपयोग न केवल हथियार और कृषि उपकरण बनाने के लिए किया गया, बल्कि प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों और लोहारों ने ऐसी तकनीकें विकसित कीं जो दुनिया के लिए आज भी एक पहेली हैं।
हालिया पुरातात्विक खोजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर प्राचीन भारतीय लौह सामग्री और उसके इतिहास की मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
भारत में लौह युग की शुरुआत (Timeline of Iron Age)
पहले इतिहासकारों का मानना था कि भारत में लौह युग की शुरुआत लगभग 1000 ईसा पूर्व (BCE) के आसपास हुई थी। लेकिन नई खोजों ने इस इतिहास को पूरी तरह बदल दिया है: संरक्षित प्राचीन धातु वस्तुएँ
लकड़ी सामग्री
भारत में लकड़ी की कला और सामग्री का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन काल से ही इमारतों, मंदिरों और घरेलू सामानों में लकड़ी का उपयोग होता रहा है। यह न केवल टिकाऊ है, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक प्रमुख हिस्सा भी है।
दुर्लभ काष्ठ एवं कलात्मक वस्तुएँ
ऐतिहासिक और पारंपरिक लकड़ी की सामग्री
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सागौन (Teak): भारतीय इतिहास में सबसे मजबूत और लोकप्रिय लकड़ी। इसे अपनी दीमक-प्रतिरोधी क्षमता के कारण मंदिरों और शाही दरवाजों के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
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शीशम (Rosewood): मुख्य रूप से नक्काशी और मजबूत फर्नीचर बनाने के लिए उपयोग की जाती है।
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देवदार और पाइन: मुख्य रूप से उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों (जैसे, हिमालय) की वास्तुकला और घरों में इनका बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।